रविवार, 9 मई 2010

मेरी माँ



कभी वो इठलाती है, कभी नाज़ दिखाती है,
आंसू मेरे गिरते तो पलकों तले उठाती है,
जब भी मैं तनहा होता दोस्त मेरी बन जाती है,
गुस्से में वो मुझसे लड़ती और बहुत सताती है,
पर एक बात सदा मुझको भाती,
प्यार से वो 'पिल्लू' कहकर बुलाती है...

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. अनिल दीक्षित ने कहा…

बेहतरीन ब्लाग है, मैटर और साज-सज्जा दोनों मामलों में। keep it up

बेनामी ने कहा…

gud job, keep it up.